Monday, June 4, 2012

बुरा न बोलो बोल रे.


बुरा न बोलो बोल रे.

बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे,
वाणी में मिसरी तो घोलो,  बोल-बोल को तोल रे।
मानव  मर जाता है लेकिन,
शब्द  कभी  ना   मरता  है।
शब्द-बाण से आहत मन का,
घाव  कभी  ना   भरता  है।
सौ-सौ बार सोच कर बोलो, बात यही अनमोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
पांचाली  के  शब्द-बाण से,
कुरूक्षेत्र   रंग  लाल  हुआ।
जंगल-जंगल  भटके पांडव,
चीरहरण, क्या हाल  हुआ।
अच्छा  बोल सको तो बोलो, वर्ना मुँह मत खोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
जो   देखोगे   और  सुनोगे,
वैसा  ही  मन  हो जायेगा।
अच्छी  बातें, अच्छा दर्शन,
जीवन  निर्मल हो जायेगा।
अच्छा मन,सबसे अच्छा धन, मनवा जरा टटोल रे,
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।
कोयल  बोले  मीठी वाणी,
कानों   में   रस   घोले  है।
पिहु-पिहु मन मोर नाचता,
सबके   मन   को  मोहे  है।
खट्टी अमियाँ  खाकर मिट्ठू,  मीठा-मीठा  बोल  रे।
बुरा न देखो,  बुरा सुनो ना,  बुरा न बोलो बोल रे।

.....आनन्द विश्वास.

Sunday, May 6, 2012

दखलंदाजी सही नहीं.

दखलंदाजी सही नहीं.

मैं  अपना  काम करूँ,  और तुम  अपना  काम करो,
एक   दूसरे  के  कामों  में, दखलंदाजी  सही   नहीं।
सूरज  रोज़  सुबह  उगता है,
और  शाम को ढल जाता है।
और चंद्रमा  रोज़  शाम  को,
आ कर सुबह चला जाता है।
एक प्रकाशित  करता  जग  को, दूजा देता  शीतलता,
दौनों  कामों  में निष्ठा है, क्या ऐसा करना सही नहीं।
नदियाँ सिंचित करतीं धरती,
धरती   देती   है   हरियाली।
वादल  ले  पानी   सागर  से,
हम  सबको   देते  खुशहाली।
जल का चक्र सदा चलता हैमौसम जिससे बदलाकरता
सृष्टि-चक्र अवरोधित कर, विपति निमंत्रण सही नहीं।
राजनीति   में   निष्ठा - प्रेमी,
और समर्पित, कर्मठ जन  हों।
सेवा  जिनका  मूल - मंत्र  हो,
और सुकोमल  निर्मल मन हो।
जन-जन के मन में बस कर जो,जन सेवा का काम करें,
ऐसे  लोगों के द्वारा क्या,शासन-संचालन  सही नहीं?
न्यायाधीश  पंच   परमेश्वर,
निर्भय हो  कर  न्याय  करें।
शीघ्र और निष्पक्ष न्याय हो,
भ्रष्ट - कर्म   से   लोग   डरें।
भ्रष्ट, अनैतिक, व्यभिचारी को,कभी न कोई माँफ करे,
राम-राज्य फिर से आये,क्या ऐसा करना  सही नहीं?

                                      ....आनन्द विश्वास

Wednesday, December 21, 2011

सजनवा के गाँव चले.

सजनवा के गाँव चले
सूरज    उगे      या     शाम    ढले,
मेरे  पाँव   सजनवा  के  गाँव  चले।
सपनों   की   रंगीन   दुनियाँ   लिये,
प्यासे  उर में  वसन्ती  तमन्ना  लिये।
मेरे  हँसते  अधर,  मेरे  बढ़ते  कदम,
अश्रुओं की सजीली सी लड़ियाँ लिये।
कोई      हँसे    या      कोई     जले,
मेरे  पाँव  सजनवा   के   गाँव  चले।
आज पहला मिलन है अनोंखा मिलन,
धीर धूलि  हुआ,  जाने  कैसी  लगन।
रात  होने   लगी,  साँस  खोने  लगी,
चाँद  तारे   चमकते   बहकते  नयन।
कोई     मिले     या     कोई     छले,
मेरे  पाँव   सजनवा  के   गाँव  चले।
दो हृदय का मिलन बन गया अब रुदन,
हैं  बिलखते  हृदय   तो  बरसते  नयन।
आत्मा   तो  मिली  जा  प्रखर  तेज  से,
है यहाँ पर बिरह तो, वहाँ  पर मिलन।
श्रेय     मिले     या       प्रेय     मिले,
मेरे   पाँव   सजनवा  के  गाँव   चले।
दुलहन   आत्मा   चल  पड़ी   देह   से,
दो  नयन  मिल गये  जा  परम गेह से।
माँ  की  ममता  लिये  देह  रोती रही,
मग  भिगोती  रही  प्यार  के  मेह  से।
ममता      हँसे     या     आँसू     झरे,
मेरे   पाँव   सजनवा  के   गाँव   चले।
       
                ...आनन्द विश्वास

Friday, September 2, 2011

शाशन का संयोजन बदलो.


  शासन का संयोजन बदलो.
   सूरज,
   जो हमसे है दूर, बहुत ही दूर.
   और फिर चलने से मजबूर,
   पंगु बिचारा , हिलने से लाचार.
   करेगा कैसे तम संहार.
   जिसके पाँव धरा पर नहीं,
   रहे हो रंग महल के नील गगन में.
   उसको क्या है फ़र्क,
   फूल की गुदन, और शूल की खरी चुभन में.
   जो रक्त-तप्त सा लाल, दहकता शोला हो,
   वो क्या प्यास बुझाएगा, प्यासे सावन की.
   जिसका नाता
   केवल मधु-मासों तक ही सीमित हो,
   वो क्या जाने बातें, पतझर के आँगन की.
   जिसने केवल दिन ही दिन देखा हो,
   वो क्या जाने, रात अमाँ की कब होती है.
   जिसने केवल दर्द प्यार का ही जाना हो,
   वो क्या जाने पीर किसी वेवा की कब रोती है.
   तो, सच तो यह है -
   जो राजा जनता से जितना दूर बसा होता है,
   शाशन में उतना ही अंधियार अधिक होता है .
   और तिमिर -
   जिसका शाशन ही पृथ्वी के अंतस में है,
   कौना-कौना करता जिसका अभिनन्दन है.
   दीपक ही -
   वैसे तो सूरज का वंशज है,
   पर रखता है, तम को अपने पास सदा.
   वाहर से भोला भाला,
   पर उगला करता श्याह कालिमा ,
   जैसे हो एजेंट, अमाँ के अंधकार का.
   और चंद्रमा -
   बाग डोर है, जिसके हाथो, घोर रात की,
   पहरेदारी करता - करता सो जाता है,
   मीत, तभी तो घोर अमावस हो जाता है.
   तो, इसीलिए तो कहता हूँ,
   शाशन का संयोजन बदलो,
   और धरा पर, नहीं गगन में,
   सूरज का अभिनन्दन कर लो.

            ... आनन्द विश्वास.

Thursday, September 1, 2011

तोतली प्रीति क्यों गँवाई...


तोतली प्रीति क्यों गँवाई...

सुधियों के  क्षितिज से, पुरवा   वह आई,     
जन्मों की सोई हुई , हर पीर उभर आई।
मौसम  का  दोष  नहीं,
सुधियाँ   वेहोश   नहीं।
योवन   मदहोश  हुआ,
अखियाँ   निर्दोष  नहीं।
सुधियों के  सागर में, लहराती  लहर आई,
जन्मों की  सोई हुई , हर  पीर उभर आई।
यादों  के   दीप   जले,
अँधियारा   दीप  तले।
रेतीले   मीत    मिले,
मेरा   विश्वास    गले।
आशा  की  मेंहदी  भी,   मातम   ले  आई,
जन्मों की  सोई हुई , हर  पीर उभर आई।
कैसा  ये  प्यार   किया,
हर  पल  बेकार जिया।
उनको   एहसास  नहीं,
जीवन क्यों वार दिया।
सांसों के पनघट पर, क्यों गगरी रितवाई,
जन्मों की सोई हुई , हर  पीर उभर आई।
बचपन  का साथ छुटा,
भोला सा प्यार  लुटा।
यौवन    दीवार   बना,
आँखों  में  प्यार  घुटा।
यौवन में आग  लगे, तोतली प्रीति क्यों गंवाई,
जन्मों  की   सोई  हुई , हर  पीर  उभर  आई।
...
आनन्द विश्वास .


Wednesday, August 10, 2011

नयन नीले .......

नयन नीले

नयन   नीले,  वसन  पीले,
चाहता  मन और  जी  ले।
छू  हृदय  का  तार  तुमने,
प्राण  में  भर प्यार तुमने।
और  अंतस्  में  समा  कर,
मन किया उजियार तुमने।
चाह   होती   नेह   भीगी,
पावसी   जलधार  पी  ले।
चंद्र  मुख  औ  चाँदनी तन,
और  निर्मल  दूध  सा मन।
गंध   चम्पई    घोलते    हैं,
झील  जैसे  कमल  लोचन।
रूप  अँटता  कब  नयन  में,
हारते     लोचन    लजीले।
पी  नयन  का  मेह   खारा,
और   फिर  भर  नेह सारा।
एक   उजड़े  से  चमन   को,
नेह    से    तुमने    सँवारा।
हो   गया   मन  क्यूँ  हरा है,
देख   कर   ये  नयन   नीले।
और   झीनी   गंध   दे   कर,
प्यार   की   सौगन्ध  दे  कर,
स्नेह  लिप्ता   उर  कमल  का,
पावसी    मकरंद    दे   कर।
कौन   सा   यह  मंत्र   फूँका,
हो   गये     नयना    हठीले।
नयन   नीले,   वसन    पीले,
चाहता   मन   और  जी  ले।

....आनन्द विश्वास   

Monday, August 8, 2011

सिर्फ मुझको वरो

              
सिर्फ मुझको वरो.

मेरे  दर्द   मेरेसिर्फ    मुझको  वरो,
क्वारी   ये  लगन  है,   सुहागन  करो।
मेरा   मन  है  कहीं, 
और  तन   है  कहीं,
नाम   तेरा    लिया,
जाम   लेना    नहीं.
रात  जाती  रही, अब  तो धीरज धरो,
मेरे  दर्द    मेरे सिर्फ   मुझको  वरो।
प्यार  उर  से  किया,
सिर्फ   उर   में   रहे।
दर्द     सहता    रहे,
ना कि  लब  से कहे।
दर्द   घुलता  रहेमुझसे   वादा  करो,
मेरे  दर्द    मेरे सिर्फ    मुझको  वरो।
प्यार   होता   अमर, 
किसके   रोके  रुका। 
तन  से  रिश्ता  नहीं, 
मन से जग भी झुका।
तन से  ना ही सही, मन  से बातें  करो,
मेरे  दर्द    मेरे सिर्फ    मुझको  वरो।
...आनन्द विश्वास.