ये वसंती पर्व सूना हो रहा है,
दर्द दिल का और दूना हो रहा है.
मंहगाई ने तोड़ी कमर है आज ऐसी,
गाँव, मुम्बई और पूना हो रहा है.
......आनन्द विश्वास.
Sunday, February 6, 2011
Monday, August 23, 2010
अश्रु गगन झखझोर.....
अश्रु गगन झखझोर दिया, क्यों.
मेरा सीमित वातायन था,
अपने से बस अपनापन था.
मेरा अपनापन सब हर कर,
अपनापन सब गेर दिया क्यों,
अश्रु गगन झखझोर.....
अनव्याहे सपनों को तुमने,
अनचाहे अपनों को तुमने.
वन -वन का वासी था मैं तो,
स्वर्णिम आँचल छोर दिया क्यों.
अश्रु गगन झखझोर...............
नयनों के नीले आँगन से,
नीलम के गीले आँचल से.
सपनों का घर वार लूट कर,
वर वश रथ पथ मोड़ दिया क्यों.
अश्रु गगन झखझोर..............
किया समर्पण मैंने किसको ,
अनजाने अपनाया किसको .
ठगनी माया आनी जानी,
राम भजन सब छोड़ दिया, क्यों.
अश्रु गगन झखझोर...............
मेरा सीमित वातायन था,
अपने से बस अपनापन था.
मेरा अपनापन सब हर कर,
अपनापन सब गेर दिया क्यों,
अश्रु गगन झखझोर.....
अनव्याहे सपनों को तुमने,
अनचाहे अपनों को तुमने.
वन -वन का वासी था मैं तो,
स्वर्णिम आँचल छोर दिया क्यों.
अश्रु गगन झखझोर...............
नयनों के नीले आँगन से,
नीलम के गीले आँचल से.
सपनों का घर वार लूट कर,
वर वश रथ पथ मोड़ दिया क्यों.
अश्रु गगन झखझोर..............
किया समर्पण मैंने किसको ,
अनजाने अपनाया किसको .
ठगनी माया आनी जानी,
राम भजन सब छोड़ दिया, क्यों.
अश्रु गगन झखझोर...............
....आनन्द विश्वास
गोबर, तुम केवल गोबर हो.....
गोबर, तुम केवल गोबर हो.....
गोबर,
तुम केवल गोबर हो,
या, सारे जग की, सकल धरोहर हो.
तुम से ही निर्मित , जन -जन का जीवन.
तुम से ही निर्मित , अन्न फसल का हर कन.
तुम आदि अंत,
तुम दिक् दिगंत .
तुम प्रकृति नटी के प्राण,
तुम्हारा अभिनन्दन .
वैसे तो -
लोग तुम्हें गोबर कहते,
पर तुम, पर के लिये,
स्वयं को अर्पित करते.
माटी में मिल , माटी को कंचन कर देते.
कृषक , देश का,
होता भाग्य विधाता ,
उसी कृषक के,
तुम हो भाग्य विधाता .
अधिक अन्न उपजा कर,
तुम, उसका भाग्य बदल देते.
और, तुम्हारे उपले-कंडे,
कलावती के घर में,
खाना रोज पकाते हैं.
तुमसे लिपे - पुते घर आँगन,
स्वास्थ्य दृष्टि से,
सर्वोत्तम कहलाते हैं.
गोबर - गैस का प्लांट तुम्हारा,
सबसे सुन्दर, सबसे प्यारा.
खेतों में देता हरियाली ,
गाँवों में देता उजियारा
भूल हुई मानव से जिसने ,
तुम्हें नहीं पहचाना.
भूल गया उपकार तुम्हारे,
खुद को ही सब कुछ माना.
.....आनंद विश्वास
गोबर,
तुम केवल गोबर हो,
या, सारे जग की, सकल धरोहर हो.
तुम से ही निर्मित , जन -जन का जीवन.
तुम से ही निर्मित , अन्न फसल का हर कन.
तुम आदि अंत,
तुम दिक् दिगंत .
तुम प्रकृति नटी के प्राण,
तुम्हारा अभिनन्दन .
वैसे तो -
लोग तुम्हें गोबर कहते,
पर तुम, पर के लिये,
स्वयं को अर्पित करते.
माटी में मिल , माटी को कंचन कर देते.
कृषक , देश का,
होता भाग्य विधाता ,
उसी कृषक के,
तुम हो भाग्य विधाता .
अधिक अन्न उपजा कर,
तुम, उसका भाग्य बदल देते.
और, तुम्हारे उपले-कंडे,
कलावती के घर में,
खाना रोज पकाते हैं.
तुमसे लिपे - पुते घर आँगन,
स्वास्थ्य दृष्टि से,
सर्वोत्तम कहलाते हैं.
गोबर - गैस का प्लांट तुम्हारा,
सबसे सुन्दर, सबसे प्यारा.
खेतों में देता हरियाली ,
गाँवों में देता उजियारा
भूल हुई मानव से जिसने ,
तुम्हें नहीं पहचाना.
भूल गया उपकार तुम्हारे,
खुद को ही सब कुछ माना.
.....आनंद विश्वास
Thursday, July 8, 2010
जिन्दगी संवार लो.
जिन्दगी संवार लो ..........
दीप लौ उबार लो, शीत की बयार से,
जिन्दगी संवार लो, प्रीति की फुहार से.
साँस भी घुटी - घुटी,
आस भी छुटी - छुटी.
प्यास प्रीति की लिये,
रात भी लुटी - लुटी.
रात को संवार लो, चंद्र के प्यार से,
जिन्दगी संवार लो,......................
दीप के नयन सजल,
सूर्य हो गया अचल.
तम सघन को देख देख,
रात गा रही गजल.
रात को वुहार दो, भोर के उजार से,
जिन्दगी संवार लो,......................
गुलाब अंग तंग हैं,
कंटकों के संग हैं.
क्या यही स्वतंत्रता,
कैद क्यों विहंग हैं.
बंधनों को काट दो, नीति की दुधार से,
जिन्दगी संवार लो,.........................
राम - राज रो उठा,
प्रीति साज सो उठा.
स्वार्थ द्वेष राग का,
समाज आज हो उठा.
समाज को उवार लो, द्वेष के विकार से,
जिन्दगी संवार लो,..........................
........ आनन्द विश्वास
क्वारी लगन ......
क्वारी लगन ......
मेरे दर्द मेरे, सिर्फ मुझको वरो,
क्वारी ये लगन है, सुहागन करो.
मेरा मन है कहीं,
और तन है कहीं.
नाम तेरा लिया ,
जाम पीना नहीं.
रात जाती रही, अब तो धीरज धरो,
मेरे दर्द मेरे .........................
प्यार उर से किया ,
सिर्फ उर में रहे.
दर्द सहता रहे,
ना कि लव से कहे.
दर्द घुलता रहे, मुझसे वादा करो,
मेरे दर्द मेरे .........................
प्यार होता अमर,
किसके रोके रुका.
तन से रिश्ता नहीं,
मन से जग भी झुका.
तन से ना ही सही, मन से बातें करो,
मेरे दर्द मेरे..........................
......आनंद विश्वास .
उजियार होगा या नहीं.
उजियार होगा या नहीं.
रवि किरण ने कर लिया , रिश्ता तिमिर से,
कौन जाने भोर को, उजियार होगा या नहीं.
हर तरफ छाई निराशा,
आस की बस लाश बाकी.
साँझ तो सिसकी अभी तक,
भोर में फैली उदासी.
तम सघन में चल पड़ी जब, तम-किरण की पालकी,
अब दीप अपने वंश का, अवतार होगा या नहीं.
अब मुस्कराहट फूल की,
नीलाम होती हर गली में.
दिन -दहाड़े भ्रवंर अब तो,
झांकता है हर कली में.
बागबाँ के चरण दूषित,क्या करें मासूम कलियाँ,
कौन जाने बाग अब, गुलजार होगा या नहीं.
करता शोषण अब शाशन ही,
महलों से दाता का नाता.
भूखा यदि रोटी मांगे तो,
हथकिड़यों का गहना पाता.
महलों का निर्माता, फुटपाथों पर सोया करता,
राम राज्य का स्वप्न अब, साकार होगा या नहीं.
मानव मानव का रक्त पिये,
क्या यही मनुज का प्यार हैं.
द्रुपदाओं के चीर खिचें,
क्या यही नीति का सार है.
सत्य ही बंदी पड़ा जब, कंस के दरवार में,
कौन जाने कृष्ण का अब,अवतार होगा या नहीं.
...... आनन्द विश्वास .
Wednesday, July 7, 2010
हम बच्चे हिन्दुस्थान के.
हम बच्चे हिन्दुस्थान के.
हम बच्चे हिन्दुस्थान के.
शीश झुकाना नहीं जानते,
शीश कटाना ही जाना.
मेरा मजहब मुझको प्यारा,
पर का मजहब कब माना.
गोविन्द सिंह के वीर सिंह,
हम पले सदा तलवारों में.
अपने बच्चे चिनवा डाले,
जीते जी दीवारों में.
रग-रग में है स्वाभिमान,
हम चलते सीना तान के.
हम बच्चे हिन्दुस्थान के.
सागर हम से थर-थर कांपे,
पर्वत शीश झुकाता है.
तूफानों की राह मोड़ कर,
वीर सदा मुस्काता है.
राणा-सांगा के हम वंशज,
और शिवा के हम भाई.
परवसता की बेडी काटी,
और घास की रोटी खाई.
स्वाभिमान की जलती ज्वाला,
हम जौहर राजस्थान के.
हम बच्चे हिन्दुस्थान के.
गौतम गाँधी के हम साधक,
विश्व शांति के अनुयायी.
मानवता के लिए जियेंगे,
राजघाट पर कसमें खाईं.
इन्गिलश भारत माँ के गहने,
हिंदी है माता की बिंदी.
गुजराती परिधान पहन कर,
गाना गाते हम सिन्धी.
शांति - दूत हम क्रांति - दूत,
हम तारे नील वितान के.
हम बच्चे हिन्दुस्थान के.
.......आनन्द विश्वास
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